15 पारंपरिक भारतीय रेसिपीज़:- भारत सिर्फ एक देश नहीं बल्कि एक विशाल संस्कृति का संगम है। यहाँ हर राज्य की अपनी अलग पहचान है—कहीं भाषा, कहीं पहनावा, कहीं रीति-रिवाज, तो कहीं खानपान। भारतीय रसोई हमेशा से विविधताओं से भरी रही है। हर मौसम और हर त्यौहार पर बनने वाले व्यंजनों की अपनी खासियत होती थी। परंतु समय के साथ जैसे-जैसे फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और मॉडर्न रेसिपीज़ हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनने लगीं, वैसे-वैसे कई पारंपरिक भारतीय व्यंजन धीरे-धीरे हमारी थालियों से गायब होने लगे।

आज हम आपको ऐसी ही कुछ पुरानी लेकिन बेहद पौष्टिक और स्वादिष्ट रेसिपीज़ के बारे में बताएंगे, जिन्हें कभी हमारे दादा-दादी रोज़ खाते थे, लेकिन अब शहरों में तो लोग इनके नाम से भी अनजान हैं।


1. बाजरे की खिचड़ी

राजस्थान और हरियाणा की पहचान मानी जाने वाली बाजरे की खिचड़ी एक समय पर किसानों और मेहनतकश लोगों का मुख्य भोजन हुआ करती थी। पहले जब आधुनिक रसोई और तरह-तरह के चावल या नूडल्स नहीं थे, तब बाजरे की खिचड़ी हर घर में बनती थी। बाजरा एक ऐसा अनाज है जिसमें प्राकृतिक गर्माहट होती है और यही वजह है कि इसे खासकर सर्दियों में ज़रूर खाया जाता था।

बनाने का तरीका बेहद सरल होता है—बाजरे को भिगोकर उसमें मूंग दाल और हल्के मसाले मिलाए जाते हैं। ऊपर से एक बड़ा चम्मच देसी घी डालने के बाद इसका स्वाद दोगुना हो जाता है। यह डिश न केवल पेट भरने वाली होती है, बल्कि शरीर को ऊर्जा भी देती है।

खासियत:

  • बाजरे में आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
  • इसे खाने से शरीर गर्म रहता है और पाचन भी दुरुस्त होता है।
  • पुराने समय में ग्रामीण भारत में इसे ताकत और सहनशक्ति बढ़ाने के लिए किसान रोज़ खाते थे।
  • आजकल यह डिश सिर्फ कुछ खास मौकों या परंपरागत रसोई में ही देखने को मिलती है।

2. सत्तू पराठा

अगर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो वहां की सबसे लोकप्रिय पारंपरिक डिश है सत्तू पराठा। सत्तू, यानी भुने हुए चने का आटा, जो प्रोटीन और मिनरल्स से भरपूर होता है। गाँवों में इसे “गरीबों का प्रोटीन” भी कहा जाता था, क्योंकि यह कम कीमत में ज़्यादा पोषण देता है।

सत्तू पराठा बनाने के लिए पहले सत्तू में बारीक कटा प्याज़, हरी मिर्च, अजवाइन, नींबू का रस और थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर भरावन तैयार किया जाता है। फिर इसे गेहूं की लोई में भरकर तवे पर देसी घी या सरसों के तेल में सेंका जाता है। गरमागरम सत्तू पराठा जब दही, अचार या हरी चटनी के साथ परोसा जाता है तो उसका स्वाद किसी भी रेस्तरां के खाने से ज़्यादा लाजवाब लगता है।

खासियत:

  • गर्मियों में यह शरीर को ठंडक पहुँचाता है और लू से बचाता है।
  • किसान और मज़दूर वर्ग के लिए यह किफायती और पौष्टिक भोजन था।
  • यह लंबे समय तक पेट भरा रखता है, जिससे काम के दौरान बार-बार भूख नहीं लगती।
  • अब यह पराठा शहरों में रोज़मर्रा के खाने से गायब होता जा रहा है, जबकि पहले हर घर की सुबह की पहचान हुआ करता था।

3. गट्टे की सब्ज़ी

राजस्थान का ज़िक्र आते ही सबसे पहले याद आता है वहाँ का राजसी खानपान। इनमें से एक है गट्टे की सब्ज़ी, जो न केवल स्वादिष्ट है बल्कि राजस्थान की रसोई की पहचान भी मानी जाती है। यह डिश तब और भी अहम हो जाती थी जब रेगिस्तानी इलाकों में ताज़ी सब्ज़ियाँ आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं। ऐसे समय में बेसन से बने गट्टे सब्ज़ियों का बेहतरीन विकल्प हुआ करते थे।

गट्टे बनाने के लिए सबसे पहले बेसन में हल्के मसाले और दही मिलाकर लोई बनाई जाती है, फिर उसे लंबे रोल्स की शक्ल देकर उबाला जाता है। बाद में इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मसालेदार दही की ग्रेवी में पकाया जाता है। जब इसे गरम-गरम बाजरे या गेहूं की रोटी के साथ खाया जाता है, तो स्वाद का आनंद दोगुना हो जाता है।

खासियत:

  • शाकाहारी लोगों के लिए यह प्रोटीन का बढ़िया स्रोत है।
  • दही और मसालों की वजह से इसका स्वाद बहुत लाजवाब होता है।
  • राजस्थान में खास मौकों, शादियों और मेहमानों के स्वागत के लिए इसे ज़रूर बनाया जाता था।
  • आज भी यह डिश कुछ घरों में ज़िंदा है, लेकिन रोज़मर्रा की थाली से धीरे-धीरे गायब होती जा रही है।

4. दाल ढोकली

गुजरात और महाराष्ट्र की सबसे पारंपरिक और लोकप्रिय डिश है दाल ढोकली। यह वास्तव में एक ऐसा व्यंजन है जिसे ‘वन पॉट मील’ कहा जा सकता है, यानी एक ही डिश में स्वाद, पौष्टिकता और पेट भरने का संतुलन।

इसे बनाने के लिए अरहर (तूर) की दाल को हल्दी और मसालों के साथ अच्छे से पकाया जाता है। फिर गेहूं के आटे की पतली लोई काटकर उसमें डाल दी जाती है। धीमी आंच पर पकने के बाद दाल में ढोकली का स्वाद घुल जाता है और यह डिश और भी मज़ेदार हो जाती है। ऊपर से घी डालकर इसे परोसने पर यह और स्वादिष्ट लगती है।

खासियत:

  • दाल और आटे का यह मेल शरीर को ज़रूरी कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन देता है।
  • इसे खाने से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, इसलिए इसे मुख्य भोजन की तरह खाया जा सकता है।
  • गुजरात और महाराष्ट्र में रविवार की शाम को परिवार साथ बैठकर दाल ढोकली का मज़ा लिया करता था।
  • अब फास्ट फूड और इंस्टेंट डिशेज़ ने इसे पीछे छोड़ दिया है और नए जनरेशन के बच्चों को इसका नाम भी शायद ही पता हो।

5. ठेठरी और खुरमी

त्योहारों का ज़िक्र हो और स्नैक्स या मिठाइयों का नाम न आए, यह संभव नहीं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की पारंपरिक रसोई में दीपावली के मौके पर ठेठरी और खुरमी बनाना परंपरा थी। ठेठरी नमकीन होती है जो आटे को बेलकर और तेल में तलकर बनाई जाती है, जबकि खुरमी एक मीठा पकवान होता है, जिसमें गेहूं के आटे की लोई को खास आकार में तलकर ऊपर से चाशनी या गुड़ चढ़ाया जाता है।

पहले के समय में जब बाज़ार से पैक्ड स्नैक्स या रेडीमेड मिठाइयाँ लाना आम बात नहीं थी, तब घर की महिलाएँ खुद ही ठेठरी और खुरमी जैसे व्यंजन तैयार करती थीं। इनका सबसे बड़ा फायदा यह था कि इन्हें बनाकर लंबे समय तक रखा जा सकता था और स्वाद भी दिनों तक ताज़ा बना रहता था।

खासियत:

  • त्योहारों में परिवार और पड़ोसियों के बीच यह स्नैक्स बाँटे जाते थे, जिससे रिश्तों में मिठास बढ़ती थी।
  • ठेठरी कुरकुरी नमकीन थी तो खुरमी मिठास से भरपूर—दोनों मिलकर थाली का संतुलन बनाते थे।
  • इन्हें बनाना आसान था और लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता था।
  • आजकल पैक्ड स्नैक्स और रेडीमेड मिठाइयों ने इनकी जगह ले ली है, लेकिन गाँवों में कुछ घर अब भी इस परंपरा को ज़िंदा रखे हुए हैं।

6. पुट्टू

केरल का मशहूर नाश्ता पुट्टू दक्षिण भारत की परंपरा और संस्कृति की पहचान माना जाता है। यह खासतौर पर सुबह के नाश्ते में बनाया जाता था। पुट्टू चावल के आटे और नारियल की परतों से तैयार किया जाता है और इसे एक खास सिलेंडरनुमा बर्तन में भाप से पकाया जाता है। पकने के बाद इसकी परतदार बनावट और हल्की खुशबू खाने वालों का मन मोह लेती है।

पुट्टू को आमतौर पर केले, चना करी या नारियल के दूध के साथ परोसा जाता है। दक्षिण भारत में इसे परिवार एक साथ बैठकर खाता था और इसे दिन की स्वस्थ शुरुआत माना जाता था।

खासियत:

  • यह पूरी तरह से ग्लूटेन-फ्री है, इसलिए सेहत के लिए बहुत हल्का और पौष्टिक भोजन माना जाता है।
  • इसमें चावल और नारियल का प्राकृतिक स्वाद मिलता है, जो शरीर को ऊर्जा देता है।
  • पुट्टू न केवल केरल, बल्कि तमिलनाडु और श्रीलंका के भी कुछ हिस्सों में पारंपरिक डिश के रूप में खाया जाता था।

7. मूली के पत्तों की सब्ज़ी

आजकल ज़्यादातर लोग मूली खाते हैं, लेकिन उसके हरे पत्तों को फेंक देते हैं। पर पुराने समय में मूली के पत्तों की सब्ज़ी खासकर सर्दियों में बहुत पसंद की जाती थी। गाँवों में महिलाएँ खेतों से ताज़े मूली के पत्ते लाकर उन्हें अच्छी तरह धोतीं और फिर सरसों के तेल, लहसुन और हल्के मसालों के साथ पकाती थीं।

इस सब्ज़ी का स्वाद थोड़ा तीखा और मिट्टी की खुशबू लिए होता है, जो रोटी और पराठे के साथ खाने पर बेहद लाजवाब लगता है। ग्रामीण इलाकों में इसे सर्दियों की खास डिश माना जाता था, क्योंकि यह शरीर को गर्म रखती और ताकत देती थी।

खासियत:

  • मूली के पत्तों में कैल्शियम, आयरन और विटामिन C भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
  • यह पाचन तंत्र को मज़बूत करती है और सर्दी-जुकाम से भी बचाव करती है।
  • पहले हर घर की रसोई में सर्दियों के दिनों में यह सब्ज़ी ज़रूर बनती थी, लेकिन अब इसकी जगह आलू, पनीर और आधुनिक सब्ज़ियों ने ले ली है।

8. बाकरवड़ी

महाराष्ट्र की पारंपरिक स्नैक बाकरवड़ी चाय के साथ खाने के लिए परफेक्ट मानी जाती थी। इसे बनाने का तरीका भी बहुत दिलचस्प है। मैदे की पतली परत पर मसालेदार भरावन लगाकर उसे रोल किया जाता है और फिर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर कुरकुरा तल लिया जाता है।

इसका सबसे बड़ा आकर्षण इसका अनोखा स्वाद है—एक ही बाइट में तीखापन, मिठास और नमकीनपन का मेल मिल जाता है। पहले यह डिश घर की महिलाएँ खुद बनाती थीं और त्योहारों या खास मौकों पर मेहमानों को परोसी जाती थी।

खासियत:

  • इसका स्वाद तीनों फ्लेवर (मीठा, नमकीन और तीखा) को साथ लेकर चलता है।
  • यह लंबे समय तक स्टोर की जा सकती है, इसलिए इसे सफर में भी ले जाया जाता था।
  • आजकल लोग इसे घर पर कम और दुकानों से ज़्यादा खरीदते हैं, जिससे इसकी पारंपरिक पहचान धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

9. बाजरे की राबड़ी

राजस्थान और गुजरात की पारंपरिक डिश बाजरे की राबड़ी सर्दियों में बेहद लोकप्रिय हुआ करती थी। इसे बनाने के लिए बाजरे के आटे को छाछ या मट्ठे में धीरे-धीरे पकाया जाता था। पकने के बाद यह गाढ़ी होकर एक खिचड़ी जैसी बनावट ले लेती थी।

इस डिश को खासकर बुज़ुर्ग और बच्चे पसंद करते थे, क्योंकि यह आसानी से पच जाती थी और शरीर को ज़रूरी ऊर्जा भी देती थी। गाँवों में दादी-नानी इसे घरेलू नुस्खे की तरह खिलाती थीं, खासकर जब किसी को पेट से जुड़ी दिक्कत होती थी।

खासियत:

  • बाजरा और छाछ का मेल पाचन तंत्र को मज़बूत बनाता है।
  • सर्दियों में शरीर को अंदर से गर्म रखने में मदद करता है।
  • यह डिश ऊर्जा, फाइबर और मिनरल्स से भरपूर होती है।
  • पहले इसे हर घर में नियमित रूप से खाया जाता था, लेकिन अब शहरों की थाली में यह बहुत कम दिखाई देती है।

10. चिवड़ा

महाराष्ट्र और उत्तर भारत में सबसे लोकप्रिय पारंपरिक स्नैक में से एक है चिवड़ा। यह हल्का-फुल्का नाश्ता घरों में बड़े पैमाने पर तैयार किया जाता था। पहले के ज़माने में जब पैक्ड स्नैक्स नहीं होते थे, तब परिवार की महिलाएँ त्यौहारों या खास मौकों पर चिवड़ा बड़ी मात्रा में बनाकर हफ्तों तक स्टोर करके रखती थीं।

चिवड़ा बनाने के लिए पतले चावल (पोहे) को हल्का तलकर उसमें मूंगफली, काजू, किशमिश, हरी मिर्च, करी पत्ते और हल्के मसाले मिलाए जाते थे। इसकी खुशबू और कुरकुरापन चाय या कॉफी के साथ इसका स्वाद और बढ़ा देता था।

खासियत:

  • यह बहुत हल्का और स्वादिष्ट स्नैक है, जिसे बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक सभी पसंद करते थे।
  • लंबे समय तक स्टोर करने योग्य होने की वजह से सफर और पिकनिक में भी इसे साथ ले जाया जाता था।
  • आजकल पैकेट वाले नमकीन और चिप्स ने इसकी जगह ले ली है, जिसकी वजह से घर का बना चिवड़ा लगभग गायब हो चुका है।

11. मंडुवा की रोटी

उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों का पारंपरिक व्यंजन है मंडुवा की रोटी। मंडुवा, जिसे रागी भी कहा जाता है, का आटा पौष्टिकता से भरपूर होता है। यह रोटी ठंडे इलाकों में रहने वाले लोगों का मुख्य भोजन हुआ करती थी।

मंडुवा की रोटी आमतौर पर गरमागरम माखन, गाढ़ी दाल या हरी सब्ज़ियों के साथ खाई जाती थी। ग्रामीण इलाकों में इसे ताकत का स्रोत माना जाता था, लेकिन शहरों में इसे अक्सर “गरीबों का खाना” कहकर नजरअंदाज किया गया। हालाँकि, आजकल हेल्दी डाइट और मिलेट्स (श्रीअन्न) के महत्व को समझते हुए मंडुवा की रोटी फिर से लोकप्रिय हो रही है।

खासियत:

  • इसमें कैल्शियम, आयरन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
  • यह हड्डियों को मज़बूत बनाती है और पाचन तंत्र के लिए भी लाभदायक है।
  • पहले गरीब वर्ग इसका सेवन करता था, लेकिन आज हेल्थ कॉन्शियस लोग इसे सुपरफूड मानते हैं।

12. गुड़ की खीर

भारतीय त्योहारों और पारंपरिक मिठाइयों की पहचान है गुड़ की खीर। इसे चावल, दूध और गुड़ से बनाया जाता है। सामान्य खीर में जहाँ चीनी डाली जाती है, वहीं इस खास डिश में गुड़ डालने से इसका स्वाद और भी लाजवाब हो जाता है।

सर्दियों के दिनों में गुड़ की खीर बनाना खास परंपरा हुआ करती थी। दादी-नानी अक्सर बच्चों को गुड़ की खीर खिलाती थीं ताकि शरीर को ज़रूरी गर्माहट और ताकत मिल सके। त्योहारों पर भी यह मिठाई थाली की शान मानी जाती थी।

खासियत:

  • गुड़ शरीर को गर्म रखता है और खून की कमी (एनीमिया) को दूर करने में मदद करता है।
  • दूध और चावल के साथ मिलकर यह एक पौष्टिक और स्वादिष्ट डेज़र्ट बन जाता है।
  • त्योहारों और खास मौकों पर इसे बनाना परंपरा थी।

13. खुरचन

उत्तर प्रदेश की पारंपरिक मिठाई खुरचन दूध प्रेमियों के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं थी। इसे बनाने का तरीका बड़ा दिलचस्प था—दूध को एक चौड़े पैन (कड़ाही) में धीमी आंच पर पकाया जाता, और जैसे-जैसे दूध गाढ़ा होता, ऊपर जमने वाली मलाई को बार-बार खुरचकर अलग किया जाता। इसी मलाई को इकट्ठा कर सजाया जाता और उसमें थोड़ी चीनी या इलायची डालकर परोसा जाता।

खुरचन का स्वाद इतना गाढ़ा और लाजवाब होता था कि यह किसी भी महंगी मिठाई को मात दे सकती थी। शादी-ब्याह, त्योहार या किसी खास मौके पर इसे ज़रूर बनाया जाता था।

खासियत:

  • खुरचन का गाढ़ा स्वाद और मलाईदार बनावट इसे बेहद खास बनाती थी।
  • यह प्रोटीन और कैल्शियम से भरपूर होती थी।
  • अब इसे बनाने का धैर्य और समय लोगों के पास नहीं है, इसलिए यह मिठाई धीरे-धीरे गायब हो रही है।

14. बथुए का रायता

सर्दियों में बनने वाला एक बेहद हेल्दी और पारंपरिक व्यंजन है बथुए का रायता। बथुआ एक हरी पत्तेदार सब्ज़ी है जो ठंड के मौसम में खेतों और बाग़ों में खूब मिलती थी। इसे उबालकर दही में मिलाया जाता और ऊपर से भुना हुआ जीरा, काला नमक और लाल मिर्च पाउडर डालकर रायता तैयार किया जाता था।

यह रायता न केवल स्वादिष्ट होता था, बल्कि सर्दियों में पाचन के लिए बेहद लाभकारी भी माना जाता था। गाँवों में इसे खासकर बाजरे की रोटी या आलू के पराठे के साथ परोसा जाता था।

खासियत:

  • बथुआ कैल्शियम और आयरन से भरपूर होता है, जो शरीर को मज़बूती देता है।
  • यह पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और शरीर में गर्मी बनाए रखता है।
  • सर्दियों की थाली का यह ज़रूरी हिस्सा था, लेकिन अब शहरों में यह परंपरा लगभग गायब हो चुकी है।

15. घर का बना ढोकला

ढोकला गुजरात की पहचान है, लेकिन पुराने समय में घर पर बना खमण ढोकला एकदम अलग स्वाद देता था। दादी-नानी बेसन का घोल बनाकर उसमें खमीर चढ़ातीं और फिर उसे भाप में पकाकर मुलायम ढोकला तैयार करती थीं। ऊपर से राई, हरी मिर्च और करी पत्तों का तड़का डालने पर इसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी।

आजकल मार्केट में ढोकला पाउडर और इंस्टेंट मिक्स उपलब्ध हैं, लेकिन उनका स्वाद और हेल्दीपन घर के बने ढोकले जैसा कभी नहीं हो सकता। पहले यह परिवार और मेहमानों के लिए नाश्ते की खास डिश हुआ करती थी।

खासियत:

  • घर का बना ढोकला ज़्यादा हेल्दी और स्वादिष्ट होता है।
  • इसमें कोई प्रिज़रवेटिव या मिलावट नहीं होती।
  • आजकल लोग इंस्टेंट मिक्स पर निर्भर हो गए हैं, जिससे असली परंपरागत ढोकला पीछे छूट गया है।

निष्कर्ष

इन पारंपरिक भारतीय व्यंजनों में सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और सेहत का गहरा खजाना छिपा है। हर रेसिपी के पीछे एक कहानी है – कहीं किसानों के जीवन का झरोखा, कहीं त्योहारों की रस्मों का हिस्सा, तो कहीं दादी-नानी की दुआओं से सजी थाली। ये भोजन न केवल पेट भरने का जरिया थे बल्कि जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक भी थे।

आज जब हमारा खानपान पिज़्ज़ा, पास्ता और बर्गर तक सिमटने लगा है, तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को इन व्यंजनों से जोड़ें। अगर हम इन्हें बच्चों की थाली में शामिल नहीं करेंगे, तो आने वाले समय में वे सिर्फ फास्ट फूड का नाम जानेंगे, अपनी संस्कृति और असली पहचान से अनजान रहेंगे।

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इसलिए अब समय आ गया है कि हम फिर से अपनी रसोई को परंपरा से जोड़ें। हफ्ते में कम से कम एक बार घर पर इन रेसिपीज़ को पकाएँ, परिवार के साथ बैठकर उनका आनंद लें और बच्चों को उनके महत्व के बारे में बताएं। ऐसा करने से न केवल स्वाद और सेहत का लाभ मिलेगा बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का सुकून भी मिलेगा।

क्योंकि असली भारतीयता सिर्फ आधुनिक पकवानों में नहीं, बल्कि उन व्यंजनों में बसती है जिन्हें हमारी दादी-नानी प्यार और अपनापन मिलाकर परोसती थीं।