मुंबई:- बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है आपको बतादे की महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर एक महत्वपूर्ण हलफनामे में स्पष्ट किया है कि आगामी गणेशोत्सव के दौरान घरेलू गणेश मूर्तियों का विसर्जन केवल कृत्रिम तालाबों में ही किया जाएगा, जबकि सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों की बड़ी प्रतिमाओं को पारंपरिक रूप से समुद्र में विसर्जित करने की अनुमति होगी।

Phote:- Amar Ujala

सरकार ने कहा कि यह फैसला पारंपरिक धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से लिया गया है। आधिकारिक बयान में बताया गया है कि बड़े आकार की गणेश मूर्तियों को समुद्र में विसर्जित करते समय सभी जरूरी पर्यावरणीय उपायों का पालन किया जाएगा।

पीओपी प्रतिबंध पर पुनर्विचार

गौरतलब है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियों पर लगाए गए प्रतिबंध से हजारों मूर्तिकारों की आजीविका प्रभावित हो रही थी। इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सांस्कृतिक मामलों के मंत्री एडवोकेट आशीष शेलार ने राजीव गांधी विज्ञान और प्रौद्योगिकी आयोग से POP के पर्यावरणीय प्रभाव पर गहन अध्ययन कराने का आग्रह किया था। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर केंद्र सरकार ने अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इसके बाद अदालत ने राज्य सरकार से विसर्जन नीति पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था, जिसके जवाब में राज्य सरकार ने हलफनामा दाखिल किया।

विसर्जन के लिए विशेष प्रबंधन

सरकार ने बताया कि समुद्र में POP मूर्तियों के विसर्जन से संभावित प्रदूषण को रोकने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएंगे और उपचारात्मक उपाय किए जाएंगे। साथ ही यह भी बताया गया कि सभी घरेलू मूर्तियों के लिए केवल कृत्रिम तालाबों का विकल्प रखा गया है ताकि प्राकृतिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखा जा सके।

सरकार का यह भी कहना है कि 100 वर्षों से भी अधिक पुरानी परंपरा को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक गणेश मंडलों की मूर्तियों का समुद्र में विसर्जन जारी रहेगा, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया पर्यावरणीय मानकों के तहत की जाएगी।

सार्वजनिक गणेशोत्सव को “राज्य महोत्सव” का दर्जा

इससे पहले 10 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में मंत्री आशीष शेलार ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को “महाराष्ट्र राज्य महोत्सव” घोषित करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

उन्होंने याद दिलाया कि इस महोत्सव की शुरुआत 1893 में लोकमान्य तिलक ने की थी और तब से यह परंपरा महाराष्ट्र की अस्मिता से जुड़ी हुई है। मंत्री शेलार ने यह भी दोहराया कि सरकार इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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अगली सुनवाई आज

मामले की अगली सुनवाई आज बॉम्बे हाईकोर्ट में होनी है, जिसमें राज्य सरकार के हलफनामे को लेकर अदालत अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। इस पर पूरे राज्य की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि यह फैसला न केवल पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को भी सीधे प्रभावित करता है।