दिल्ली हाई कोर्ट में बड़ा फैसला : दिल्ली हाई कोर्ट में अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया से जुडी आबकारी नीति मामले से सुनवाई के दौरान एक अहम संवैधानिक स्थिति सामने आई, आपको बता दें जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को केस से अलग करने की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। आपको बता दें

करीब एक घंटे तक चले अपने विस्तृत आदेश में उन्होंने उन सभी आरोपों और आशंकाओं का जवाब दिया, जो इस मामले में उठाए गए थे। यह मामला Arvind Kejriwal, Manish Sisodia समेत अन्य आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है।
अदालत का रुख: “झूठ बार-बार दोहराने से सच नहीं बनता”
आपको बता दें जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि अदालत तथ्यों और कानून के आधार पर काम करती है, न कि अफवाहों या सोशल मीडिया पर फैल रही बातों के आधार पर। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह के आरोप, चाहे वे कितनी ही बार दोहराए जाएं, उन्हें सत्य नहीं बना सकते।
क्यों नहीं हटीं जस्टिस शर्मा: जानें 9 अहम कारण
1. केवल आशंका के आधार पर जज नहीं बदल सकते
आपको बता दें अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत आशंकाएं या संदेह न्यायिक निष्पक्षता को प्रभावित नहीं करते। Arvind Kejriwal ने खुद स्वीकार किया कि वे जज की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे, ऐसे में केवल “संभावित शंका” के आधार पर जज को हटाना उचित नहीं है।
2. सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेना पूर्वाग्रह का संकेत नहीं
आपको बता दें आरएसएस से जुड़े आरोपों पर कोर्ट ने कहा कि जज विभिन्न बार एसोसिएशनों और कानूनी कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, जो उनके कर्तव्यों का हिस्सा है। इसे किसी विचारधारा से जोड़ना गलत है।
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3. जज के परिवार को भी पेशे की स्वतंत्रता
हितों के टकराव के आरोपों पर अदालत ने कहा कि जज के परिवार के सदस्यों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता। यह उनका मौलिक अधिकार है, और इसका मौजूदा केस पर कोई प्रभाव साबित नहीं हुआ।
4. चुनिंदा आदेशों के आधार पर आरोप
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल उन आदेशों को आधार बनाया, जो उनके खिलाफ गए। जब अदालत से राहत मिली थी, तब ऐसे कोई आरोप नहीं लगाए गए थे।
5. सुप्रीम कोर्ट ने नहीं की कोई नकारात्मक टिप्पणी
आपको बता दें इस मामले में जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि उनके आदेशों की समीक्षा Supreme Court of India द्वारा की गई, लेकिन कहीं भी उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाया गया।
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6. राजनीतिक बयानों पर कोर्ट का नियंत्रण नहीं
गृह मंत्री Amit Shah के बयान का हवाला देते हुए केस से हटने की मांग को अदालत ने खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि वह किसी भी राजनीतिक बयान को नियंत्रित नहीं कर सकता।
7. केस से हटना गलत उदाहरण स्थापित करेगा
जस्टिस शर्मा ने कहा कि यदि वे खुद को अलग कर लेती हैं, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठेंगे और गलत संदेश जाएगा कि बाहरी दबाव से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
8. याचिकाकर्ता की “दुविधापूर्ण रणनीति”
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति बनाई गई है, जिसमें किसी भी फैसले को गलत तरीके से पेश किया जा सकता है। राहत मिले तो दबाव का आरोप, और न मिले तो पूर्वाग्रह का दावा—यह न्यायिक प्रक्रिया के लिए सही नहीं है।
9. कर्तव्य से पीछे हटना संभव नहीं
अपने आदेश के अंत में जस्टिस शर्मा ने कहा कि जज के रूप में उन्होंने संविधान की शपथ ली है। ऐसे में बिना ठोस आधार के केस से हटना उनके कर्तव्य का त्याग होगा, जो न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है।
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मामले का व्यापक संदर्भ
आपको बता दें यह पूरा विवाद दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें कई राजनीतिक नेताओं पर आरोप लगे थे। इस मामले ने देशभर में राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया है। सीबीआई द्वारा दायर अपील पर सुनवाई के दौरान यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया।
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का यह रुख साफ करता है कि अदालतें दबाव या धारणा के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती हैं।
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