US-ईरान शांति वार्ता की नई उम्मीद:- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव एक बार फिर बातचीत की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। हालांकि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष वार्ता फिलहाल शुरू नहीं हुई है, लेकिन अप्रत्यक्ष संवाद के संकेत मिलने लगे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान अहम भूमिका निभाता दिखाई दे रहा है।

हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस्लामाबाद का दौरा किया, जहां उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, द्विपक्षीय संबंधों और अमेरिका-ईरान तनाव को कम करने के संभावित रास्तों पर चर्चा हुई।

प्रत्यक्ष बातचीत पर क्यों अटका मामला?

ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और दबाव की नीति में नरमी नहीं दिखाता, तब तक सीधी बातचीत संभव नहीं है। तेहरान का मानना है कि वार्ता तभी सार्थक होगी जब पहले भरोसे का माहौल बनाया जाए।

यानी फिलहाल सीधी बैठक की संभावना कम है, लेकिन बैकचैनल और मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी रह सकती है।

पाकिस्तान क्यों बना अहम खिलाड़ी?

पाकिस्तान इस समय खुद को एक संतुलित मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। इस्लामाबाद के ईरान और अमेरिका दोनों से रिश्ते हैं, ऐसे में वह दोनों देशों के बीच संवाद का पुल बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अगर सफल रहता है तो यह उसकी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी।

तनाव आखिर कितना गहरा है?

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ा है। खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हुईं, समुद्री मार्गों पर टकराव की खबरें आईं और तेल आपूर्ति को लेकर वैश्विक चिंता भी बढ़ी।

ऐसे माहौल में बातचीत की छोटी सी पहल भी बड़ी मानी जा रही है।

ओमान और रूस भी सक्रिय

सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, ओमान और रूस भी दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य करने की कोशिशों में लगे हैं। पहले भी ओमान कई बार अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त तथा अप्रत्यक्ष वार्ताओं की मेजबानी कर चुका है।

ईरान के अंदरूनी हालात भी चुनौती

ईरान के भीतर भी राजनीतिक मतभेद इस प्रक्रिया को कठिन बना रहे हैं। एक ओर सुधारवादी गुट बातचीत चाहता है, वहीं कट्टरपंथी वर्ग अमेरिका पर भरोसा करने के खिलाफ है। यही वजह है कि किसी भी फैसले में समय लग सकता है।

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क्या जल्द शुरू होगी शांति वार्ता?

फिलहाल संकेत सकारात्मक जरूर हैं, लेकिन रास्ता आसान नहीं है। दोनों देशों के बीच वर्षों पुराना अविश्वास, प्रतिबंधों का दबाव और क्षेत्रीय राजनीति बड़ी बाधाएं हैं।

फिर भी अगर मध्यस्थ देशों की कोशिशें सफल रहीं, तो आने वाले समय में अमेरिका और ईरान वार्ता की मेज पर लौट सकते हैं।

निष्कर्ष

दुनिया की नजर इस समय अमेरिका-ईरान संबंधों पर टिकी है। अगर बातचीत आगे बढ़ती है तो इसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर भी पड़ेगा। अब देखना यह है कि क्या पाकिस्तान की मध्यस्थता इतिहास रच पाएगी या तनाव फिर हावी होगा।