Nepal Flood : जिस तरह से नेपाल में बाढ़ ने भयानक तबाही मचाई है इससे पहले आज तक बाढ़ से ऐसी तबाही नहीं देखी गई होगी आपको बता दें नेपाल में बुधवार सुबह आए जलसैलाब ने कुछ ही घंटों में भारी तबाही मचा दी। चीन तिब्बत सीमा से सटे रसुवा जिले से शुरू हुई यह बाढ़ भोटेकोशी नदी में तेज़ी से नीचे की ओर बढ़ी और अपने रास्ते में आए सभी गांव, सड़कें, पुल और पनबिजली प्रोजेक्ट सब कुछ बहा ले गई। इस हादसे ने न सिर्फ नेपाल और तिब्बत को झकझोरा, बल्कि इसकी आंच अब भारत के बिहार राज्य तक पहुंच चुकी है, जहां गंडक नदी के किनारे बसे इलाकों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह जलसैलाब आया कैसे, इसके पीछे कौन-कौन से कारण गिनाए जा रहे हैं, और भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
इतनी बड़ी बाढ़ आई कैसे?
अब यह भी समझना ज़रूरी है कि आखिर इतनी भयानक बाढ़ आई कैसे इसके पीछे क्या कारण है आपको बता दूँ काठमांडू यूनिवर्सिटी के जलवायु शोधकर्ता प्रोफेसर रिजान भक्त कायस्थ के मुताबिक, शुरुआती आकलन यही बताता है कि बर्फ का एक बड़ा हिमस्खलन ल्हेंदे नदी में जा गिरा और उसने नदी का रास्ता अस्थायी रूप से रोक दिया। इससे पीछे की तरफ बड़ी मात्रा में पानी और मलबा जमा होता गया। कुछ ही देर बाद यह प्राकृतिक बांध टूट गया, और जमा हुआ पानी एक झटके में नीचे की ओर बह निकला। यही पानी भोटेकोशी नदी में पहुंचा और देखते ही देखते विनाशकारी बाढ़ में बदल गया।
आपको बता दें नेपाल के जल एवं मौसम विज्ञान विभाग की बाढ़ पूर्वानुमान शाखा के प्रमुख बिनोद पराजुली के हवाले से बताया गया है कि चीन की तरफ से मिली शुरुआती सैटेलाइट तस्वीरों में मित्री पुल से करीब 20 किलोमीटर ऊपर की ओर नदी में मलबा जमा दिखा। उनके मुताबिक बर्फ और मलबे से एक अस्थायी झील बनी, जो बाद जाकर में फट गई। पराजुली ने यह भी कहा कि अगर सिर्फ साफ पानी आता तो इतनी तबाही नहीं होती, लेकिन पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा मिल जाने से बाढ़ की गहराई और उसकी विनाशकारी ताकत कई गुना बढ़ गई।
क्या भूकंप ने हिमस्खलन को ट्रिगर किया?
अब सोचने वाली बात है यह की क्या भूकंप ने हिमस्खलन को ट्रिगर क्या आपको बता दें यह आशंका भी जांच के दायरे में है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, बुधवार सुबह 8:37 बजे तिब्बत में 4.4 तीव्रता का भूकंप जैसा झटका दर्ज हुआ, जिसका केंद्र गोसाईकुंडा से करीब 47 किलोमीटर उत्तर में था। इसके करीब तीन मिनट बाद ही भोटेकोशी में अचानक बाढ़ का सिलसिला शुरू हो गया। बाद में USGS ने अपने आकलन में बदलाव करते हुए बताया कि यह झटका असल में भूकंप नहीं, बल्कि हिमस्खलन के कारण पैदा हुई कंपन तरंग थी, जो 5.2 तीव्रता के भूकंप जितनी शक्तिशाली थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप, उसके ठीक बाद हिमस्खलन, और फिर नदी का रास्ता अस्थायी रूप से बंद होना — इन तीनों कड़ियों को आपस में जोड़कर देखा जाना चाहिए।
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क्या ग्लेशियर झील भी फटी है?
आपको बता दें नेपाल के जल एवं मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि नेपाल या चीन तिब्बत के ऊपरी इलाकों में किसी ग्लेशियर झील के फटने (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF) की आशंका की भी जांच चल रही है। खास बात यह है कि रसुवा में मंगलवार और बुधवार को भारी बारिश दर्ज नहीं हुई थी, यानी सामान्य मॉनसूनी बारिश इस बाढ़ की वजह नहीं मानी जा रही। ऐसे में हिमस्खलन से नदी का अस्थायी रूप से रुकना, या ग्लेशियर झील का फटना — इन दोनों में से किसी एक या दोनों कारणों को ज्यादा वजनदार माना जा रहा है।
काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) पहले ही तिब्बत के पोइकू जलग्रहण क्षेत्र को ग्लेशियर झील फटने से आने वाली बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील बता चुका है। जानकारों का कहना है कि जिस रफ्तार से हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उससे ऐसी नई-नई अस्थायी झीलें बन रही हैं जो बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक फट सकती हैं।
क्या इस इलाके में पहले भी ऐसा हुआ है?
जी हां, आपको बता दें नेपाल में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले जुलाई 2025 में भी इसी भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ आई थी, जिसमें रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट पर बना मित्री पुल पूरी तरह बह गया था और नेपाल-चीन सीमा पूरी तरह बंद हो गई थी। उस समय भी नेपाल के जल एवं मौसम विज्ञान विभाग ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर इसे तिब्बत क्षेत्र में एक सुप्राग्लेशियल झील (ग्लेशियर के ऊपर बनी झील) के फटने से आई बाढ़ बताया था। यानी यह इलाका बार-बार इस तरह की आपदाओं का सामना कर चुका है, और यह पैटर्न अब और गंभीर होता जा रहा है।
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भारतीय यात्री कैसे फंस गए?
आपको बता दें इस बाढ़ की चपेट में आने वाले और संपर्क से बाहर हुए अधिकतर भारतीय, कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल के रास्ते तिब्बत जा रहे थे। ये भारतीय और अन्य विदेशी यात्री बुधवार सुबह नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी में मौजूद थे और वहां से सीमा पार कर तिब्बत में दाखिल होने की तैयारी कर रहे थे। ठीक इसी दौरान बाढ़ ने सीमावर्ती गांवों, सड़कों और अहम बुनियादी ढांचे को पूरी तरह बहा दिया, जिससे यात्रियों का बाहरी दुनिया से संपर्क टूट गया। कुछ ट्रैवल एजेंसियों ने बताया है कि उनके साथ गए दल में अमेरिकी, ब्रिटिश और अन्य देशों के पर्यटक भी शामिल थे, जो अब तक लापता हैं।
चीन की तरफ निर्माण गतिविधियों को लेकर उठे सवाल — दावा अभी अपुष्ट
आपको बता दें घटना के बाद नेपाल के कुछ पत्रकारों के एक समूह ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि तिब्बत में ऊंचे हिमालयी इलाकों में चीन द्वारा बनाई गई “श्याओकांग” (Xiaokang) बस्तियां और ग्यिरोंग कस्बे का निर्माण इसकी एक वजह हो सकता है। इस समूह के मुताबिक पहाड़ काटकर और नदी के प्राकृतिक बहाव के करीब निर्माण करने से इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ है, जिससे हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। दावा यह भी किया गया कि ग्यिरोंग पोर्ट का निर्माण नदी के संगम के पास होने से पानी के बहाव की दिशा प्रभावित हुई और पानी तेज़ी से नेपाल की तरफ आया।
हालांकि यह ज़रूर बता देना ज़रूरी है कि यह दावा फिलहाल स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच से पुष्ट नहीं हुआ है। नेपाल के कुछ सांसदों ने संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से चीन के साथ औपचारिक बातचीत और सूचना साझा करने की व्यवस्था बनाने की मांग की है। वहीं नेपाली अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में इस बार की घटना का कारण पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी चट्टान, बर्फ और मिट्टी की परत) के अचानक कमजोर पड़ने को भी माना जा रहा है, जो हल्की बारिश या तापमान बढ़ने से भी अस्थिर हो सकता है।
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अब बिहार को खतरा क्यों है?
अब समझते हैं आखिर बिहार को खतरा क्यों है आपको बता दें तिब्बत से निकलने वाली भोटेकोशी नदी आगे नेपाल की त्रिशूली नदी में मिलती है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी नदी का हिस्सा बनती है, और यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद गंडक कहलाती है। यानी नेपाल में आया अतिरिक्त पानी अंततः बिहार की गंडक नदी में पहुंच सकता है।
इसी आशंका के मद्देनज़र बिहार सरकार ने बुधवार को ही हाई अलर्ट जारी कर दिया था। राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक गंडक नदी में अचानक करीब तीन मीटर तक पानी बढ़ने की आशंका जताई गई थी। एहतियात के तौर पर पश्चिम चंपारण स्थित वाल्मीकिनगर बैराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए, ताकि पानी का दबाव सुरक्षित तरीके से निकाला जा सके। अधिकारियों के मुताबिक दोपहर तक बैराज से करीब 86,000 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा था, जो शाम तक बढ़कर करीब डेढ़ लाख क्यूसेक तक पहुंच गया।
आपको बता दें बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा की और सीमावर्ती जिलों में चौबीसों घंटे निगरानी के निर्देश दिए। पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण सहित गंडक बेसिन के कई ज़िलों में प्रशासन को सतर्क रहने और ज़रूरत पड़ने पर निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने को कहा गया है। हालांकि राहत की बात यह है कि नेपाल के देवघाट गेज पॉइंट पर नदी का जलस्तर खतरे के निशान से काफी नीचे दर्ज किया गया, जिससे बड़े स्तर पर तबाही की आशंका फिलहाल टली हुई मानी जा रही है, लेकिन प्रशासन ने सतर्कता में कोई कमी नहीं रखी है।
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फिलहाल राहत की बात यह है की इस बाढ़ के पीछे की असल वजह को लेकर नेपाल और चीन दोनों तरफ के वैज्ञानिक विस्तृत जांच में जुटे हैं। हिमस्खलन, अस्थायी झील का फटना और पर्माफ्रॉस्ट अस्थिरता — इन तीन प्राकृतिक कारणों को मुख्य वजह माना जा रहा है, जबकि चीन की निर्माण गतिविधियों को लेकर उठाए जा रहे सवाल अभी दावों के स्तर पर ही हैं। लेकिन एक बात साफ है — हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान और तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर, ऐसी आपदाओं के खतरे को हर साल और बढ़ा रहे हैं, और इसका असर अब सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि मैदानी इलाकों तक पहुंच रहा है।
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