मिलाद-उल-नबी 5 सितंबर:– मिलाद-उल-नबी, जिसे बारावफ़ात या ईद-ए-मिलाद-उन-नबी भी कहते हैं, इस्लामिक दुनिया में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह त्यौहार हर साल रबी-उल-अव्वल के 12वें दिन मनाया जाता है। यह दिन उस अल्लाह के रसूल की याद में मनाया जाता है जिनका जन्म और दुनिया से रवानगी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन और रहमत का संदेश है।

जन्म और निधन
पैगंबर साहब का जन्म मक्का में हुआ और उनका जीवन इस्लाम और इंसानियत की राह दिखाने वाला रहा। उनका निधन मदीना में हुआ, जब वह 62 वर्ष जे थे और उनका जीवन समाप्त होने के बावजूद उनकी शिक्षाएँ आज भी मुसलमानों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
क्यों मनाया जाता है
मिलाद-उल-नबी का उद्देश्य है उनके जीवन और शिक्षाओं का स्मरण करना। मुसलमान इस दिन खुशी और श्रद्धा दोनों के साथ उनका सम्मान करते हैं।
- मुसलमान उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं।
- मस्जिदों और घरों में सजावट और रोशनी की जाती है।
- दुआ और कुरान पाठ किया जाता है।
- जरूरतमंदों को खाना और दान देकर पुण्य अर्जित किया जाता है।
- घर में मीठा बनाया जाता है और नियाज़ लगायी जाती है
नियाज़ और सवाब
इस दिन कई मुसलमान अपनी पढ़ी हुई नमाज़, कुरान के हिस्से या सूरह और जो मीठा बनाया जाता है उसके नाम की नियाज़ लगायी जाती है पैगंबर हजरत मुहम्मद के नाम की यह दिन सेवा और दान का प्रतीक है। लोग दुआ करते हैं कि उनके किए गए नेक कामों का सवाब उनके ऊपर और उनके माध्यम से पहुँचाए।
खाने-पीने की परंपरा
इस दिन खास पकवान बनाए जाते हैं। आमतौर पर:
- हलवा, खिचड़ी, जलेबी और सूखे मेवे
- सामूहिक भोजन, जिसे गरीब और जरूरतमंदों में बांटा जाता है
भोजन केवल आनंद के लिए नहीं बल्कि सामाजिक सेवा और भाईचारे का प्रतीक भी है।
मनाने का तरीका
मुसलमान इस दिन को खुशी और श्रद्धा दोनों भावों के साथ मनाते हैं। उनके जन्म की खुशी में खुश होकर भी और उनके निधन पैर शोक मनाकर भी सब मिलाद उल नबी का त्यौहार मना सकते है यह दिन आध्यात्मिक सोच, दुआ, दान और सामुदायिक मिलन का अवसर है।
निष्कर्ष
मिलाद-उल-नबी सिर्फ जन्मदिन या निधन का दिन नहीं है। यह श्रद्धा, सेवा और आध्यात्मिक जागरूकता का दिन है। इसे खुशी और शोक दोनों भावों के साथ मनाया जाता है ताकि मुसलमान उनके जीवन और संदेश को याद कर सकें और उसे अपनी जिंदगी में उतार सकें।