टेक्सटाइल सेक्टर पर डबल मार : भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। आपको बता दें एक तरफ टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम कर रहे श्रमिकों के वेतन में प्रस्तावित बढ़ोतरी से उत्पादन लागत बढ़ने का दबाव है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव ने निर्यात को पहले ही काफी हद तक कमजोर कर दिया है। उद्योग से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर बड़ा असर पड़ सकता है।

वेतन बढ़ोतरी से बढ़ेगा लागत का दबाव
आपको बता दें टेक्सटाइल निर्यातकों के अनुसार, श्रमिकों के वेतन में करीब 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी से उत्पादन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इस उद्योग में पहले से ही मुनाफा बेहद सीमित होता है, ऐसे में थोड़ी सी लागत बढ़ोतरी भी निर्यात ऑर्डर पर सीधा असर डाल सकती है।
नोएडा स्थित अपैरल निर्यात क्लस्टर से जुड़े उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बेहद तीव्र है। कई बार केवल कुछ सेंट के अंतर से ऑर्डर दूसरे देशों को चला जाता है। मौजूदा समय में भारत को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है, जहां उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम है।
पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
आपको बता दें हाल ही में टेक्सटाइल निर्यात पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव का भी सीधा असर पड़ा है। खाड़ी देशों में भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों की मांग बेहद प्रभावित हुई है, जिससे निर्यातकों को ऑर्डर में कमी का सामना करना पड़ रहा है।
इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग लागत में बढ़ोतरी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। निर्यातकों का कहना है कि पहले से घटते ऑर्डर और बढ़ती लागत के कारण कई कंपनियों को बैंक ऋण चुकाने में भी कठिनाई हो रही है।
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निर्यात में गिरावट के संकेत
वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को दर्शाते हैं। यार्न, फैब्रिक और गारमेंट—तीनों ही श्रेणियों में निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है।
- मार्च महीने में गारमेंट निर्यात में सालाना आधार पर लगभग 19 प्रतिशत की गिरावट देखी गई
- यार्न और मैन-मेड फाइबर के निर्यात में भी करीब 13 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई
- फरवरी महीने में भी गारमेंट निर्यात कमजोर रहा
विशेषज्ञों के अनुसार, आपको बता दें यह गिरावट केवल अस्थायी नहीं बल्कि एक बड़े ट्रेंड की ओर संकेत कर रही है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नए बाजार की तलाश, लेकिन चुनौतियां बरकरार
सरकार की ओर से निर्यातकों को नए अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशने में मदद की जा रही है। हालांकि, उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि नए बाजार में अपनी पकड़ बनाने में समय लगता है।
किसी भी नए खरीदार के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करना एक लंबी प्रक्रिया होती है, और यह उम्मीद करना कि कुछ महीनों में पश्चिम एशिया के नुकसान की भरपाई हो जाएगी, व्यवहारिक नहीं है।
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रोजगार पर भी पड़ सकता है असर
टेक्सटाइल उद्योग भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला सेक्टर है। ऐसे में यदि निर्यात लगातार कमजोर रहता है और लागत बढ़ती है, तो इसका सीधा असर रोजगार पर भी पड़ सकता है।
उद्योग जगत का मानना है कि यदि प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो छोटे और मध्यम स्तर के निर्यातकों के लिए स्थिति और भी कठिन हो सकती है।
भारत का टेक्सटाइल सेक्टर इस समय एक नाजुक दौर से गुजर रहा है, जहां बढ़ती लागत और घटते निर्यात ऑर्डर मिलकर संकट को गहरा बना रहे हैं। श्रमिकों के वेतन में बढ़ोतरी सामाजिक दृष्टि से आवश्यक हो सकती है, लेकिन इसके साथ उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए संतुलित नीति की जरूरत है। आने वाले महीनों में सरकार और उद्योग के बीच तालमेल ही तय करेगा कि भारत इस चुनौती से कैसे बाहर निकलता है।
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