दिल्ली आबकारी मामला : कई महीनो से चल रहा आबकारी निति मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है आपको बता दें दिल्ली के चर्चित आबकारी नीति मामले में एक नया मोड़ फिर से सामने आया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई से खुद को अलग करने का फैसला लिया है।

आपको बता दें इससे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इसी तरह का कदम उठा चुके हैं। दोनों नेताओं के इस फैसले ने न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया बल्कि राजनीतिक माहौल को भी गर्म कर दिया है।
मनीष सिसोदिया ने अदालत से बनाई दूरी
आपको बता दें आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया है कि वे इस मामले में न तो खुद अदालत में पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील बहस करेगा।
आपको बता दें अपने पत्र में सिसोदिया ने लिखा कि उन्हें मौजूदा परिस्थितियों में निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अब उनके पास ‘सत्याग्रह’ के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उनके इस बयान से साफ है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर असंतोष जता रहे हैं।
केजरीवाल पहले ही ले चुके हैं ऐसा फैसला
इससे पहले अरविंद केजरीवाल जो की दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री हैं वो भी इसी मामले में हाईकोर्ट की कार्यवाही से खुद को अलग करने का ऐलान कर चुके हैं। उन्होंने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को लिखे अपने विस्तृत पत्र में कहा था कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर यह निर्णय ले रहे हैं।
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केजरीवाल ने यह भी माना कि उनके इस फैसले से उनके कानूनी हित प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन वे इसके परिणामों के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपने पत्र में यह भी दोहराया कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी उतना ही जरूरी है।
सत्याग्रह का हवाला और न्यायपालिका पर सवाल
आपको बता दें दोनों नेताओं ने अपने-अपने पत्रों में महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत का जिक्र किया है। केजरीवाल ने इसे एक नैतिक विरोध का तरीका बताते हुए कहा कि यह कदम केवल इस मामले तक सीमित है।
उन्होंने कुछ पूर्व मामलों का उदाहरण भी दिया, जहां न्यायाधीशों ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए खुद को सुनवाई से अलग कर लिया था। केजरीवाल के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं दिख रही है।
क्या है पूरा मामला?
अब समझते हैं आखिर क्या है पूरा मामला आपको बता दें यह मामला दिल्ली की नई आबकारी नीति से जुड़ा हुआ है, जिसमें कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें इस मामले में अरविंद केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को राहत दी गई थी। इस अपील पर फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है।
गौरतलब है कि केजरीवाल ने पहले अदालत से अनुरोध किया था कि न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा इस मामले से खुद को अलग कर लें, लेकिन अदालत ने इस मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इसके बाद ही उन्होंने और अब सिसोदिया ने यह कड़ा कदम उठाया है।
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बढ़ता राजनीतिक और कानूनी तनाव
फिर एक बार इस घटनाक्रम ने दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। जहां एक तरफ आम आदमी पार्टी इसे न्याय के लिए संघर्ष बता रही है, वहीं विपक्ष इसे न्यायिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश के रूप में देख रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत में पेश न होना एक असामान्य कदम है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। इससे मामले की सुनवाई की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।
दिल्ली आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का अदालत में पेश न होने का फैसला एक बड़ा और असामान्य कदम माना जा रहा है। इससे न केवल कानूनी प्रक्रिया पर असर पड़ेगा, बल्कि राजनीतिक बहस भी और तेज होगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत और जांच एजेंसियां इस स्थिति को कैसे संभालती हैं और इस मामले की सुनवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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