कई महीनों से मिडिल ईस्ट में लगातार जारी तनाव अब केवल इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा, बल्कि आपको बता दें इसके असर अमेरिका और इजरायल के राजनीतिक तालमेल पर भी साफ दिखने लगे हैं। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि ईरान को लेकर दोनों देशों की रणनीति एक जैसी नहीं रह गई है।

ट्रंप बनाम नेतन्याहू

आपको बता दें एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्षेत्र में तनाव कम करने और किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध से बचने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सुरक्षा और सैन्य दबाव को प्राथमिकता देते हुए लगातार आक्रामक रुख अपना रहे हैं।

इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों देशों के बीच पहली बार रणनीतिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं?

लेबनान और ईरान पर कार्रवाई ने बढ़ाया तनाव

आपको बता दें हाल के दिनों में मध्य पूर्व में हुई सैन्य गतिविधियों ने स्थिति को और बेहद गंभीर बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार इजरायल ने लेबनान में सैन्य कार्रवाई की, जबकि इसके बाद क्षेत्रीय प्रतिक्रिया तेज हो गई।

वहीँ आपको बता दें इसके बाद ईरान की ओर से मिसाइल हमलों की खबरें सामने आईं और जवाब में इजरायल ने ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों को निशाना बुरी तरह से निशाना बनाया। इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को बड़े संघर्ष की ओर धकेलने की आशंका बढ़ा दी।

इसी दौरान यह चर्चा भी तेज हुई कि अमेरिका और इजरायल के बीच इन सैन्य कदमों को लेकर पहले जैसा समन्वय दिखाई नहीं दे रहा।

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ट्रंप क्यों चाहते हैं तनाव कम हो?

आपको बता दें अमेरिकी राजनीति के नजरिए से देखें तो ट्रंप के सामने कई चुनौतियाँ हैं।

ट्रम्प की राजनीतिक पहचान लंबे समय से इस बात पर बनी रही है कि अमेरिका को महंगे विदेशी युद्धों से बाहर रखा जाए। ऐसे समय में अगर मध्य पूर्व में संघर्ष लंबा चलता है, तो उसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और घरेलू राजनीति पर पड़ सकता है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन नहीं चाहता कि ईरान के साथ संभावित बातचीत या कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद हो जाएँ।

अमेरिका की चिंता यह भी है कि लगातार सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को बड़े युद्ध की ओर ले जा सकती है, जिसका आर्थिक और राजनीतिक बोझ अंततः अमेरिका को भी उठाना पड़ सकता है।

नेतन्याहू का रुख अलग क्यों दिखाई दे रहा है?

इस युद्ध में नेतन्याहू का रूख आखिर अलग क्यों दिख रहा है आपको बता दें दूसरी तरफ इजरायल की प्राथमिकताएँ अलग मानी जा रही हैं।

आपको बता दें इजरायल लंबे समय से ईरान को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताता रहा है। ऐसे में किसी भी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई करना उसकी रणनीति का हिस्सा माना जाता है।

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विश्लेषकों के अनुसार इजरायल यह संदेश देना चाहता है कि यदि उस पर हमला होता है, तो वह जवाब देने में पीछे नहीं हटेगा।

इसके अलावा घरेलू राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है। सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर मजबूत नेतृत्व दिखाना इजरायली राजनीति में हमेशा से प्रभावशाली रहा है।

क्या अमेरिका और इजरायल के हित अब अलग हो रहे हैं?

आपको बता दें अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह मतभेद रिश्तों में टूट का संकेत नहीं है, लेकिन प्राथमिकताओं का अंतर जरूर दिखाता है।

अमेरिका देश क्षेत्रीय स्थिरता, वैश्विक बाजार और कूटनीतिक विकल्पों को बचाए रखना चाहता है।

वहीं इजरायल का ध्यान अपनी सुरक्षा, सैन्य बढ़त और भविष्य में संभावित खतरों को रोकने पर केंद्रित है।

यही कारण है कि दोनों देशों की सार्वजनिक बयानबाजी में अंतर दिखाई देने लगा है।

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ईरान के साथ संभावित समझौते को लेकर इजरायल की चिंता

आपको बता दें कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल को यह आशंका भी हो सकती है कि भविष्य में अमेरिका यदि ईरान के साथ किसी समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है, तो उसका असर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ सकता है।

आपको बता दें इजरायल की चिंता यह रहती है कि किसी भी नरम समझौते से ईरान को रणनीतिक बढ़त न मिल जाए।

इसी वजह से इजरायल कई बार ऐसी स्थिति बनाना चाहता है जिसमें उसके सुरक्षा हितों को नजरअंदाज न किया जा सके।

आगे क्या हो सकता है?

आपको बता दें आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या अमेरिका और इजरायल अपनी रणनीतियों में फिर से तालमेल बना पाएंगे या मध्य पूर्व की यह स्थिति दोनों देशों के बीच नई राजनीतिक दूरी पैदा करेगी।

फिलहाल आपको बता दें इतना स्पष्ट है कि ईरान को लेकर दोनों देशों का अंतिम लक्ष्य भले समान दिखे, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने का तरीका अलग-अलग नजर आ रहा है।

यदि आने वाले दिनों में कूटनीति सफल नहीं होती, तो मध्य पूर्व एक और बड़े अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकता है

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ईरान संकट ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि सहयोगी देशों के बीच भी राष्ट्रीय हित अलग हो सकते हैं। अमेरिका जहां युद्ध को सीमित रखने और राजनीतिक समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है, वहीं इजरायल अपने सुरक्षा हितों को सबसे ऊपर रख रहा है। यही अंतर आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

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