हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा इस समय वैश्विक राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लगभग नौ वर्षों बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का बीजिंग पहुंचना केवल एक औपचारिक दौरा नहीं माना जा रहा, बल्कि इस दौरे को दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के बीच बदलते रिश्तों का संकेत माना जा रहा है। आपको बता दें यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और चीन के बीच पिछले कई महीनों से व्यापारिक तनाव, टैरिफ विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही थी।

हालांकि इस मुलाकात के दौरान ट्रंप द्वारा चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping की खुले तौर पर तारीफ करना और उन्हें “महान नेता” तथा “मित्र” कहना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए संकेत दे रहा है। आपको बता दें विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच यह नरमी आने वाले समय में भारत की रणनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है।
अमेरिका-चीन संबंधों में अचानक आई नरमी क्यों महत्वपूर्ण है?
आपको बता दें पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं और हाल ही में ईरान अमेरिका युद्ध को लेकर भी अमेरिका और चीन के बीच लगातार तनाव बना रहा है क्योंकि चीन ईरान के साथ खड़ा था। व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, ताइवान मुद्दा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों को आमने-सामने खड़ा कर दिया था। लेकिन अब ट्रंप का बीजिंग दौरा यह दर्शाता है कि दोनों देश टकराव के बजाय स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव और कई मोर्चों पर अमेरिकी चुनौतियों ने वॉशिंगटन को अपनी रणनीति में बदलाव के लिए मजबूर किया है। अमेरिका फिलहाल मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ संघर्ष जैसी परिस्थितियों में उलझा हुआ है, जिसका असर उसकी वैश्विक रणनीतिक क्षमता पर भी पड़ रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलता समीकरण?
आखिर आपको बता दें भारत लंबे समय से अमेरिका और चीन दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलने की नीति अपनाता रहा है। एक तरफ अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक और तकनीकी साझेदार है, वहीं दूसरी ओर चीन भारत का बड़ा व्यापारिक भागीदार बना हुआ है। ऐसे में यदि अमेरिका और चीन के संबंधों में स्थिरता बढ़ती है, तो इसका सीधा असर भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय रणनीति पर पड़ सकता है।
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भारत लगातार बहुध्रुवीय दुनिया और बहुध्रुवीय एशिया की बात करता आया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका का प्रभाव और एशिया में चीन की ताकत बेहद मजबूत है। ऐसे में भारत को दोनों शक्तियों के बीच संतुलन साधना पड़ता है ताकि किसी भी पक्ष के साथ उसके रिश्ते दूसरे के खिलाफ न दिखाई दें।
विशेषज्ञों ने क्या कहा?
अब समझते हैं इस मुलाकात को लेकर प्रमुख विशेषज्ञों ने क्या कहा है आपको बता दें रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि ट्रंप इस दौरे में अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में नजर आए। उनके अनुसार, अमेरिका फिलहाल कई वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें मध्य-पूर्व का तनाव प्रमुख है। इससे अमेरिका की सैन्य और रणनीतिक क्षमता पर भी दबाव बढ़ा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका अभी भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भर है, खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स जैसे संसाधनों में। चीन ने पिछले वर्षों में यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इन संसाधनों का इस्तेमाल रणनीतिक हथियार की तरह कर सकता है। इसी कारण अमेरिका को अपने रुख में नरमी लानी पड़ी है।
चेलानी के अनुसार, ट्रंप की चीन नीति में यह बदलाव केवल कूटनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा रणनीतिक परिवर्तन माना जा सकता है। उनका मानना है कि इससे भारत की वह भूमिका कमजोर पड़ सकती है, जिसे अमेरिका चीन के मुकाबले एक संभावित संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखता रहा है।
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क्या क्वॉड की भूमिका कमजोर पड़ सकती है?
आपको बता दें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के समूह Quadrilateral Security Dialogue यानी क्वॉड को पिछले कुछ वर्षों में चीन के बढ़ते प्रभाव के जवाब के रूप में देखा गया था। लेकिन यदि अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में सुधार होता है, तो क्वॉड की रणनीतिक दिशा और प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच टकराव कम होता है, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं। इसका असर क्वॉड की सक्रियता और उसके भविष्य पर भी पड़ सकता है।
भारत के सामने क्या चुनौती होगी?
अब समझते हैं भारत के सामने सबसे बड़ी चुनोती क्या होगी आपको बता दें भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती आने वाले समय में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना होगी। भारत न तो पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में खड़ा दिखना चाहता है और न ही चीन के करीब जाना चाहता है। ऐसे में बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच संतुलित विदेश नीति बनाए रखना नई दिल्ली के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
इसके अलावा भारत को अपनी आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर भी जोर देना होगा, ताकि किसी भी वैश्विक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।
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डोनाल्ड ट्रंप का यह चीन दौरा केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत माना जा रहा है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती नरमी दुनिया की शक्ति संरचना को नए रूप में परिभाषित कर सकती है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में भारत को अधिक सतर्क और संतुलित रणनीति अपनानी होगी, क्योंकि वैश्विक राजनीति अब तेजी से नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है।
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