भोजशाला:- मध्य प्रदेश के धार में मौजूद भोजशाला आज सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं है। यह भारत के सबसे चर्चित धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों में से एक बन चुकी है। सदियों पुरानी यह जगह इतिहास, आस्था, राजनीति और पहचान का ऐसा केंद्र बन गई है, जहाँ हर पक्ष अपने-अपने सच के साथ खड़ा दिखाई देता है। 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह विवाद फिर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।

आखिर क्या है भोजशाला?

भोजशाला 11वीं सदी का एक ASI-संरक्षित स्मारक है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह राजा भोज द्वारा बनवाया गया माँ वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है, जहाँ कमालुद्दीन चिश्ती की मजार मौजूद है और वर्षों से नमाज़ अदा की जाती रही है।

यही वजह है कि यह स्थान सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि दो अलग धार्मिक मान्यताओं का प्रतीक बन गया।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

भोजशाला विवाद की जड़ें 19वीं सदी तक जाती हैं। ब्रिटिश काल में यहाँ खुदाई के दौरान कई प्राचीन अवशेष और संस्कृत शिलालेख मिलने का दावा किया गया। इसी दौरान माँ सरस्वती की एक प्रतिमा मिलने की बात सामने आई, जिसे बाद में लंदन ले जाया गया।

इसके बाद हिंदू पक्ष ने इस स्थान को प्राचीन सरस्वती मंदिर बताना शुरू किया, जबकि मुस्लिम समाज इसे सदियों पुरानी मस्जिद मानता रहा। 1935 में धार प्रशासन ने परिसर के बाहर “भोजशाला-कमाल मौला” का बोर्ड लगाया, जिसके बाद यह विवाद और स्पष्ट रूप से सामने आने लगा।

वर्षों तक कैसे चली व्यवस्था?

1952 में हिंदू समाज ने यहाँ भोज दिवस मनाना शुरू किया, जबकि 1953 में मुस्लिम समाज ने उर्स मनाया। धीरे-धीरे दोनों समुदायों के धार्मिक कार्यक्रमों के कारण तनाव बढ़ने लगा।

बाद में ASI ने 2003 में एक व्यवस्था लागू की, जिसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी गई और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज़ पढ़ने की इजाजत मिली। कई वर्षों तक यही व्यवस्था चलती रही, लेकिन विवाद कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

ASI सर्वे ने कैसे बदल दिया पूरा मामला?

2024 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI को भोजशाला का वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया। लगभग 98 दिनों तक चले इस सर्वे के बाद 2000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट अदालत में जमा की गई।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा ढाँचे से पहले यहाँ परमार राजाओं के समय का एक विशाल मंदिर था। रिपोर्ट में संस्कृत शिलालेख, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक, यज्ञ कुंड, नक्काशीदार स्तंभ और शिक्षा से जुड़े प्रमाण मिलने की बात कही गई।

ASI ने यह भी कहा कि परिसर में मौजूद कई आकृतियों और मूर्तियों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया था।

हालाँकि मुस्लिम पक्ष ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया और कहा कि यह रिपोर्ट एकतरफा तरीके से तैयार की गई है।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर मानते हुए बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने 2003 की उस व्यवस्था को रद्द कर दिया, जिसके तहत शुक्रवार को नमाज़ की अनुमति थी।

फैसले के बाद हिंदू संगठनों ने इसे ऐतिहासिक जीत बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही।

यानी अब यह विवाद एक नए कानूनी चरण में प्रवेश कर चुका है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

भोजशाला विवाद सिर्फ एक धार्मिक स्थल का मामला नहीं है। यह भारत में इतिहास और आस्था के टकराव का बड़ा उदाहरण बन चुका है। इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सदियों पुराने धार्मिक दावों का फैसला आखिर किस आधार पर होना चाहिए — इतिहास, पुरातत्व, परंपरा या वर्तमान धार्मिक उपयोग?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भोजशाला का फैसला आने वाले समय में ऐसे कई अन्य विवादों को भी प्रभावित कर सकता है।

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सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है

भोजशाला आज सिर्फ पत्थरों और दीवारों की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत के इतिहास, राजनीति और सामाजिक संवेदनशीलता का प्रतीक बन चुकी है। अदालत अपना फैसला सुना सकती है, लेकिन समाज में शांति बनाए रखना लोगों के हाथ में ही है।

क्योंकि आखिर में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है —
क्या इतिहास हमें जोड़ता है… या बाँट देता है?

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