मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और तेल सप्लाई में बाधा के चलते दक्षिण एशिया के कई देशों में ईंधन संकट तेजी से गहराता जा रहा है। ऐसे समय में भारत दक्षिण एसिया के देशों के लिए एक भरोसेमंद ऊर्जा सप्लायर के रूप में उभर रहा है। आपको बता दें दक्षिण एशिया के सभी मुख्य देश जिनमे शामिल हैं नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश अब अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।

भारत की बढ़ती भूमिका: क्षेत्रीय ऊर्जा सपोर्ट सिस्टम
आपको बता दें ईरान से जुड़े तनाव और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में बाधा के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा है। जानकारी के लिए आपको बता दें कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।
इस स्थिति में दक्षिण एशिया के इन देशों के लिए भारत एक स्थिर और भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आया है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी देश को अतिरिक्त सहायता देने से पहले देश की घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी।
नेपाल में गैस संकट, अतिरिक्त सप्लाई की मांग
नेपाल, जो एलपीजी गैस के लिए लगभग पूरी तरह भारत पर निर्भर है, इस समय नेपाल एलपीजी गैस को लेकर गंभीर संकट का सामना कर रहा है। उसे हर महीने लगभग 48,000 टन गैस मिलती है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए उसने 3,000 टन अतिरिक्त सप्लाई की मांग की है।
फिलहाल भारत तय समझौते के अनुसार ही गैस भेज रहा है। वहीं नेपाल सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए गैस की राशनिंग शुरू कर दी है और लोगों को आधा सिलेंडर देने का निर्णय लिया है, ताकि उपलब्ध स्टॉक लंबे समय तक चल सके।
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श्रीलंका को भारत से राहत, बड़ा संकट टला
वहीँ दूसरी और आपको बता दें श्रीलंका में ईंधन संकट बेहद गंभीर हो गया था, लेकिन भारत की त्वरित मदद से स्थिति कुछ हद तक नियंत्रण में आई है। आपको बता दें भारत ने श्रीलंका में करीब 38,000 मीट्रिक टन पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति की है।
मिडिल ईस्ट के सप्लायरों द्वारा सप्लाई रोकने के बाद श्रीलंका में हालात बिगड़ गए थे। सरकार को स्कूल और कॉलेज बंद करने पड़े, सार्वजनिक परिवहन सीमित करना पड़ा और ईंधन बचाने के लिए हर सप्ताह एक दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पड़ा।
भारत की इस मदद को श्रीलंका ने खुले तौर पर सराहा है, जिससे दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत हुए हैं।
बांग्लादेश में डीजल की कमी, सख्त नियम लागू
वहीँ बांग्लादेश में भी इस संकट से अछूता नहीं है। भारत हर साल उसे लगभग 1.8 लाख टन डीजल सप्लाई करता है और हाल ही में बांग्लादेश को पाइपलाइन के जरिए अतिरिक्त ईंधन भी भेजा गया है।
इसके बावजूद भी वहां कमी बनी हुई है। हालात को देखते हुए सरकार ने कई सख्त कदम उठाए हैं, जैसे विश्वविद्यालयों को बंद करना और मोटरसाइकिल चालकों के लिए ईंधन की सीमा तय करना।
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राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, इस संकट के समय बांग्लादेश का भारत की ओर रुख करना क्षेत्रीय सहयोग की अहमियत को दर्शाता है।
मालदीव ने भी भारत से मांगी मदद
जदक मालदीव, जो आमतौर पर ओमान देश से ईंधन आयात करता है, अब चल रहे ईरान-इजराइल युद्ध के चलते सप्लाई बाधित होने के कारण भारत से सहायता मांग रहा है। उसने भारत के साथ अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह की सप्लाई पर बातचीत शुरू की है।
यह संकेत देता है कि भारत क्षेत्र में एक भरोसेमंद ऊर्जा पार्टनर के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
मॉरीशस और सेशेल्स की नजर भी भारत पर
मॉरीशस और सेशेल्स जैसे देश फिलहाल भारत के संपर्क में हैं और स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि उन्होंने अभी औपचारिक रूप से मदद की मांग नहीं की है, लेकिन जरूरत पड़ने पर भारत से सहायता लेने की संभावना बनी हुई है।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
आपको बता दें एक तरफ भारत अपने पड़ोसी देशों की मदद कर क्षेत्रीय प्रभाव को और भी तेजी से बढ़ा सकता है, वहीं दूसरी तरफ उसे अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों का भी ध्यान रखना है।
सरकार इस संतुलन को बनाए रखने के लिए लगातार रणनीतिक फैसले ले रही है। साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और वहां फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने की कोशिश भी जारी है।
संकट में अवसर: भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका
आपको बता दें विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट ने भारत को एक “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” के रूप में उभरने का अवसर दिया है। अगर भारत सभी देशों के लिए सही रणनीति अपनाता है, तो वह दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ और मजबूत को और भी अच्छा कर सकता है।
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हालांकि सीमित संसाधनों के कारण सभी देशों की जरूरतों को पूरा करना आसान नहीं होगा, इसलिए भारत को सोच-समझकर कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है, लेकिन इसी संकट के बीच भारत एक मजबूत और भरोसेमंद ऊर्जा केंद्र के रूप में उभर रहा है। पड़ोसी देशों के लिए भारत एक उम्मीद बन गया है, लेकिन इस भूमिका को निभाने के लिए उसे घरेलू जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।
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