पश्चिम एशिया युद्ध का वैश्विक असर : पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बढ़ते सैन्य संघर्ष के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई पर बहुत गंभीर असर पड़ा है। वहीँ देखा जाए तो इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।

हालात अब ऐसे बन गए हैं कि जिस संघर्ष को पहले अमेरिका के लिए रणनीतिक बढ़त माना जा रहा था, वही अब उसके लिए आर्थिक और सैन्य चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल
पश्चिम एशिया में चल रहे लगातार संघर्ष के बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास सुरक्षा हालात को अस्थिर कर दिया है। आपको बता दें यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा तेल और गैस इसी रास्ते से होकर वैश्विक बाजार तक पहुंचता है और अगर यही रास्ता ईरान बंद कर देगा तो इसका असर पूरी दुनिया में देखने को मिल सकता है ।

हाल के दिनों में टैंकरों पर हमलों और समुद्री बारूदी सुरंगों की आशंका के कारण कई जहाजों ने इस मार्ग से गुजरने से परहेज करना शुरू कर दिया है। परिणामस्वरूप ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया।
इस वैश्विक संकट ने न केवल एशिया बल्कि यूरोप और अमेरिका तक के ऊर्जा बाजार को बुरी तरह से प्रभावित किया है।
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किन देशों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर
एशियाई देशों पर भारी दबाव
आपको बता दें एशिया के कई देश खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। इसलिए इस संकट का सबसे बड़ा असर इन्हीं खाड़ी देशों पर देखने को मिल रहा है।
वहीँ आपको आपको बता दें दक्षिण एशिया के कुछ देशों में हाल ही में ऊर्जा की कमी के चलते सरकारी संस्थानों में कामकाज सीमित करने जैसे ज़रूरी कदम उठाने पड़े हैं। पाकिस्तान ने ईंधन बचाने के लिए सरकारी कार्यालयों में चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करने और कर्मचारियों को वर्क-फ्रॉम-होम की सुविधा देने जैसे रास्ते अपनाए हैं।
जापान और दक्षिण कोरिया की चिंता
वहीँ आपको बता दें जापान अपने कुल तेल आयात का लगभग 95 प्रतिशत खाड़ी देशों से प्राप्त करता है, जबकि दक्षिण कोरिया भी बड़ी मात्रा में तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। इस गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए दक्षिण कोरिया ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नियंत्रण लगाने का फैसला किया है, जबकि जापान देश अपने रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग करने की तैयारी कर रहा है।
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भारत की स्थिति
आप बात करते हैं इस वैश्विक संकट के दौरान भारत की स्तिथि क्या है आपको बता दें भारत भी पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात पर निर्भर है, लेकिन हाल ही में चल रहे हालातों से निपटने के लिए भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। इसके बावजूद घरेलू रसोई गैस और कमर्शियल सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीँ कई शहरों में सिलेंडर की मांग अचानक बढ़ने से सप्लाई में देरी की शिकायतें भी सामने आई हैं।
चीन का मजबूत भंडार
इस वैश्विक संकट के दौरान चीन भी इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन उसके पास लगभग तीन से चार महीने के लिए पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार वर्तमान में मौजूद है। इसलिए अन्य देशों की तुलना में वह इस संकट का सामना करने की बेहतर स्थिति में है।
अमेरिका को कैसे हो रहा आर्थिक और सैन्य नुकसान
वहीँ पश्चिम एशिया में चल रहे इस घातक संघर्ष ने एक विकसित और शत्किशाली देश अमेरिका को भी कई स्तरों पर प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

1. युद्ध खर्च में तेज बढ़ोतरी
इस सैन्य संघर्ष के शुरुआती सप्ताह में ही अमेरिकी सैन्य अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं। मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाव के लिए लगातार तैनाती के कारण अमेरिकी नौसेना पर भी दबाव बढ़ रहा है।
2. पेट्रोल की कीमतों में उछाल
वहीँ एक विकसित देश अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत तक की तेज वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ राज्यों में पेट्रोल की कीमत पांच डॉलर प्रति गैलन से भी ऊपर पहुंच गई है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
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3. रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग
ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए अमेरिका को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व से करोड़ों बैरल तेल जारी करना पड़ा है। यह कदम बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए उठाया गया, लेकिन देखा जाए तो इस कदम से भविष्य के लिए सुरक्षा भंडार कम हो सकता है।
4. कृषि और खाद्य महंगाई का खतरा
उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होने से कृषि क्षेत्र पर भी असर पड़ सकता है। यूरिया की कीमतों में तेजी आने से खेती की लागत बढ़ने और खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
5. विनिर्माण उद्योग पर असर
एल्यूमीनियम समेत कई धातुओं की आपूर्ति प्रभावित होने से अमेरिका के ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस और निर्माण उद्योग की लागत बढ़ सकती है। इससे उत्पादन और कीमतों दोनों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।
6. प्राकृतिक गैस बाजार में दबाव
ऊर्जा संकट के कारण अमेरिकी गैस की मांग बढ़ी है, जिससे गैस की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी जा रही है।
जहाजों की आवाजाही में तेज गिरावट
वहीँ कुछ विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है अब इस रास्ते से बहुत कम ही जहाज़ गुज़र रहे हैं। आपको बता दें सुरक्षा खतरे के कारण कई टैंकर अपने ट्रांसपोंडर बंद करके यात्रा कर रहे हैं, जिससे वास्तविक आंकड़े जुटाना भी मुश्किल हो गया है।
कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि हाल के दिनों में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सामान्य से काफी कम हो गई है।
समुद्री सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंताएं
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में किसी भी बड़े नौसैनिक अभियान में भारी जोखिम शामिल है।
आपको जानकारी के लिए बता दें ईरान भी हथियारों के मामले में किसी से भी कम नहीं हैं ईरान के पास एक एक मिसाइल है जो बहुत तगड़ा नुक्सान पहुँचाने में पूरी तरह से सक्षम है। ईरान के पास समुद्री बारूदी सुरंगें, तेज गति वाली हमलावर नौकाएं और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं, जो संकरे समुद्री मार्ग में बड़े युद्धपोतों को भी खतरे में डाल सकते हैं। इसी कारण कई देशों के सैन्य विश्लेषक इस क्षेत्र में सीधे सैन्य हस्तक्षेप को अत्यंत जोखिमपूर्ण मान रहे हैं।
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लगातार हो रहे जहाजों पर हमले
आपको बता दें हाल के दिनों में कई कार्गो जहाजों और तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। कुछ मामलों में मिसाइल हमलों और अज्ञात प्रोजेक्टाइल से जहाजों को नुकसान पहुंचा है।
इन घटनाओं के बाद सैकड़ों टैंकर समुद्र में अलग-अलग स्थानों पर रुकने को मजबूर हो गए हैं, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है।
निष्कर्ष
आपको बता दें पश्चिम एशिया में जारी यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई देने लगा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते खतरे ने दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ महंगाई और आर्थिक अस्थिरता का जोखिम भी बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसका प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है।
